Friday, December 6, 2019

6 दिसंबर: शौर्य दिवस बनाम काला दिवस

अयोध्या में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद से ही छह दिसंबर को हर साल विश्व हिन्दू परिषद और उसके सहयोगी संगठन अयोध्या समेत देश भर में शौर्य दिवस मनाते रहे हैं.

वहीं मुस्लिम समाज इसे काला दिवस के रूप में मनाता रहा है, लेकिन अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद क्या इस बार भी ये दोनों पक्ष ऐसा करेंगे, इसे लेकर कोई एकराय नहीं है.

अयोध्या में धारा 144 को देखते हुए प्रशासन भी किसी तरह के ऐसे कार्यक्रम को लेकर सतर्क और सख़्त है जिससे सांप्रदायिक सौहार्द को कोई नुक़सान पहुंचे.

प्रशासन ने बिना किसी सूचना के कोई भी कार्यक्रम आयोजित करने पर सख़्त मनाही की है तो दूसरी ओर रामलला की ओर जाने वाले रास्ते की सुरक्षा भी बढ़ा दी गई है.

विश्व हिन्दू परिषद की तरफ से छह दिसंबर को होने वाले शौर्य दिवस का मुख्य आयोजन अयोध्या में होता है, जबकि अन्य जगहों पर भी इस मौक़े पर कई कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं.

विश्व हिन्दू परिषद की स्थानीय इकाई ने इस बार शौर्य दिवस न मनाने का फ़ैसला किया है लेकिन परिषद की केंद्रीय इकाई ने स्पष्ट तौर पर यह संदेश जारी किया है कि शौर्य दिवस पहले की भांति ही इस बार भी मनाया जाएगा.

विश्व हिन्दू परिषद के राष्ट्रीय प्रवक्ता विनोद बंसल ने बीबीसी को बताया, "हमारे शौर्य दिवस कार्यक्रम में कोई बदलाव नहीं हुआ है. ये संपूर्ण भारत वर्ष में वैसे ही मनाया जाएगा जैसे हर साल मनाया जाता है. इस कार्यक्रम से न तो कभी सौहार्द बिगड़ा है और न ही आगे बिगड़ेगा. रामजन्मभूमि पर निर्णय हर्ष का विषय है लेकिन इसकी वजह से शौर्य दिवस कार्यक्रम स्थगित नहीं होगा."

वहीं विश्व हिन्दू परिषद की स्थानीय इकाई ने साफ़तौर पर शौर्य दिवस न मनाने का फ़ैसला किया है.

विश्व हिन्दू परिषद के प्रदेश प्रवक्ता शरद शर्मा कहते हैं, "संतों के निर्देश पर ही अयोध्या में वीएचपी अपनी कार्ययोजना बनाती है. श्रीराम जन्म भूमि न्यास के अध्यक्ष और मणिराम छावनी के महंत नृत्यगोपाल दास ने साफ़ शब्दों में कहा है कि मंदिर के पक्ष में फ़ैसला आने के बाद खुशी और ग़म के कार्यक्रम आयोजित करने का औचित्य नहीं है.''

''इनका आयोजन अब इस साल से बंद होना चाहिए. तो उसी के अनुसार हम इस बार ऐसा कोई कार्यक्रम नहीं करने जा रहे हैं. हां, घरों, मंदिरों इत्यादि जगहों पर दीप जलाना, पूजा अर्चना जैसे कार्यक्रम किए जा सकते हैं."

यह पूछे जाने पर कि वीएचपी के केंद्रीय नेतृत्व ने तो स्पष्ट रूप से शौर्य दिवस मनाने को कहा है, शरद शर्मा इससे अनभिज्ञता जताते हुए कहते हैं कि केंद्रीय नेतृत्व ने गीता जयंती मनाने की बात कही है और गीता जयंती आठ दिसंबर को है.

गीता जयंती मनाने की बात को विनोद बंसल कुछ इस तरह स्पष्ट करते हैं, "बाबरी मस्जिद जिस दिन ढहाई गई थी उस दिन गीता जयंती थी. उसी उपलक्ष्य में हम शौर्य दिवस गीता जयंती के दिन मनाते हैं. इस बार यह आठ दिसंबर को पड़ रही है लेकिन यह कार्यक्रम छह दिसंबर से शुरू होकर दस दिसंबर तक आयोजित किया जाएंगे."

Friday, November 22, 2019

नित्यानंद: सूरज को उगने से रोक देने का दावा करने वाले

दक्षिण भारत के विवादित धर्म गुरू और एक वक़्त सेक्स सीडी के मामले में फंसने वाले और अपने को स्वामी नित्यानंद कहने वाले एक बार फिर सुर्ख़ियों में हैं. उनका आश्रम 'सर्वाज्ञपीठम' भी विवादों में हैं.

ख़ुद को ईश्वर का अवतार बताने वाले नित्यानंद पर दो लड़कियों के कथित अपहरण और उन्हें बंदी बनाने का मामला दर्ज हुआ है. यह मामला अहमदाबाद ग्राणीण थाने में दर्ज हुआ है.

पुलिस ने इस मामले में नित्यानंद के आश्रम की दो संचालिकाओं 'प्राणप्रिया' और 'तत्वप्रिया' को हिरासत में ले लिया है.

इस संबंध में जब हमने मामले की जांच कर रहे पुलिस अधिकारी केटी कमारिया से बात की तो उन्होंने बताया कि इस केस में आईपीसी की धारा 365, 344, 323, 504, 506, 114 के तहत चाइल्ड लेबर, अपहरण और प्रताड़ना का केस दर्ज किया गया है.

हालांकि पुलिस अधिकारी ने इस बात का खंडन किया कि इस मामले के प्रकाश में आने के बाद से नित्यानंद फ़रार हैं. उन्होंने कहा कि नित्यानंद साल 2016 से ही बाहर हैं लेकिन वो कहां हैं, विदेश में या कहीं और... इसकी जांच चल रही है.

पुलिस ने बताया कि अहमदाबाद स्थित उनके आश्रम की ब्रांच को शुरू हुए ज़्यादा वक़्त नहीं हुआ है. फ़िलहाल जांच का दायरा अहमदाबाद तक ही है लेकिन गुजरात पुलिस उनके मुख्य आश्रम जो बेंगलुरु से कुछ दूरी पर है, वहां भी जा सकती है.

लापता लड़कियों के अभिभावकों की ओर से गुजरात हाईकोर्ट में केस दर्ज कराया गया है. लड़कियों के माता-पिता का कहना है कि वर्ष 2012 में तमिलनाडु में नित्यानंद के आश्रम के द्वारा एक शैक्षणिक कार्यक्रम का संचालन किया गया था. जिसमें उन्होंने अपनी चार बेटियों को भी भेजा था. जिनकी उम्र सात से पंद्रह साल के बीच थी.

इस दंपती का आरोप है कि बाद में आश्रम ने ख़ुद से ही इन लड़कियों को आश्रम की अहमदाबाद स्थित ब्रांच भेज दिया था.

यह ब्रांच अहमदाबाद के दिल्ली पब्लिक स्कूल (ईस्ट) के कैंपस में स्थित है. पुलिस के साथ जब अपनी बेटियों को खोजने के लिए यह जोड़ा आश्रम की इस ब्रांच पहुंचा तो उन्हें ये बताया गया कि वहां उनकी सिर्फ़ दो ही बेटियां आई थीं जबकि दो अन्य बेटियों ने यहां जाने से इनकार कर दिया था.

दंपती ने आरोप लगाया है कि उनकी बेटियों का अपहरण हुआ है और उन्हें ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से बंदी बनाकर रखा गया है.

इससे पहले साल 2010 में स्वामी नित्यानंद के ख़िलाफ़ धोखाधड़ी और अश्लीलता का मामला दर्ज किया गया था. उनकी एक कथित सेक्स सीडी भी सामने आई थी. इस कथित सेक्स सीडी में उन्हें एक दक्षिण भारतीय अभिनेत्री के साथ आपत्तिजनक स्थिति में दिखाया गया था.

उसके बाद फॉरेंसिक लैब में जांच हुई तो पाया गया कि सीडी प्रामाणिक है. लेकिन नित्यानंद के आश्रम ने भारत में हुई जांच को ग़लत बताते हुए अमरीकी लैब में हुई जांच का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि सीडी के साथ छेड़छाड़ हुई है.

हालांकि इस मामले में भी नित्यानंद को गिरफ़्तार किया गया लेकिन कुछ दिन बाद ही वो ज़मानत पर बाहर आ गए. इसके अलावा बेंगलुरु स्थित उनके आश्रम में भी एक बार रेड पड़ चुकी है. इस रेड में कई पैकेट कॉन्डम और गांजा बरामद हुआ था.

वर्ष 2012 में स्वामी नित्यानंद पर बलात्कार के आरोप भी लगे जिसके बाद उन्हें जेल की सज़ा सुनाई गई. उस विवाद के बाद भी वो फ़रार हो गए थे लेकिन पांच दिन बाद उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया था जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया था.

जिस वक़्त वो फ़रार थे पुलिस ने उनके आश्रम की भी जांच की थी. जहां पुलिस को यह भी शिकायत मिली थी कि उन्होंने अपने अनुयायी के साथ बलात्कार किया है.

बलात्कार और दुष्कर्म के इन मामलों और आरोपों के अलावा भी वो कई बार अपने बयानों को लेकर भी विवादों में रहे.

नित्यानंद ने एक बार दावा किया था कि वो बंदरों और दूसरे कुछ जानवरों को संस्कृत और तमिल बोलना सिखा सकते हैं. उन्होंने कहा था कि उन्होंने इसकी प्रमाणिक जांच भी कर रखी है.

वो अल्बर्ट आइंस्टाइन को भी चुनौती दे चुके हैं. उनका कहना था कि आइंस्टाइन का सिद्धांत ग़लत है. जिसके बाद वो काफ़ी ट्रोल भी हुए थे.

एक वायरल वीडियो में स्वामी नित्यानंद यह दावा करते हुए भी दिख रहे हैं कि उन्होंने बेंगलुरु में सूरज को 40 मिनट तक उगने से रोक दिया था.

इतना ही नहीं एक प्रवचन में भूतों से दोस्ती का भी दावा किया था.

Thursday, October 24, 2019

तुर्की या सीरिया: किसका साथ दे रहे हैं पुतिन

सीरिया से सटी तुर्की की सीमा से कुर्दबलों को दूर रखने के लिए रूस और तुर्की के बीच मंगलवार देर रात को एक अहम समझौता हुआ.

काले सागर के नज़दीक रूस के सोची शहर में घंटों तक चली इस बातचीत के बाद रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और तुर्की के राष्ट्रपति रचेप तैय्यप अर्दोआन के बीच 10-सूत्री समझौते पर हस्ताक्षर किए गए.

दोनों पक्षों में इस बात पर सहमति बनी है कि सीरिया के उत्तरी इलाक़े में रास अल-एन से तेल अब्याद तक तुर्की सेफ़ ज़ोन बनाएगा. कुर्द बलों को उनके हथियारों समेत इस इलाक़े से पीछे जाने के लिए 150 घंटे का वक़्त दिया गया है.

पीस स्प्रिंग नाम का ये अभियान 23 अक्तूबर दोपहर 12.00 बजे से शुरु होगा जिसे पूरा करने में रूसी सैन्य पुलिस और सीरियाई सीमाबल मदद करेंगे.

इसके साथ मानबिज और तल रफ़ात से भी कुर्द बल हटाने और इस इलाक़े से चरमपंथियों की घुसपैठ को रोकने पर भी दोनों पक्षों में सहमति बन गई है.

बैठक के बाद पुतिन ने फ़ोन पर सारिया के राष्ट्रपति बशर अल-असद से बात की और उन्हें अर्दोआन के साथ हुए समझौते के बारे में जानकारी दी.

बशर अल-असद ने इस समझौते का स्वागत किया है और पुतिन को अहम भूमिका निभाने के लिए शुक्रिया अदा किया है. उन्होंने तुर्की-सीरिया सीमा पर रूसी सैन्य पुलिस के साथ सीरियाई सुरक्षाबलों की तैनाती के लिए भी हामी भर दी है.

लेकिन इस बात को अधिक वक़्त नहीं हुआ है जब तुर्की और रूस एक दूसरे के आमने सामने थे. 2015 में तुर्की सेना ने सीरिया की सीमा के पास रूस का एक लड़ाकू विमान मार गिराया था. उस वक़्त अर्दोआन ने कहा था कि रूस 'आग से खेल' रहा है.

मामला बढ़ा और रूस ने तुर्की के साथ अपने वीज़ा मुक्त संबंधों को निलंबित किया और तुर्की पर आर्थिक प्रतिबंध लगाने की योजना तक बना डाली.

लेकिन 2018 आते-आते मध्यपूर्व में समीकरण बदलने लगे. कथित इस्लामिक स्टेट को पीछे धकेलने के लिए ब्रिटेन, फ्रांस और अमरीका की सेनाओं ने सीरिया में हमले किए तो रूस सीरियाई सरकार के साथ खड़ा हो गया.

इस दौरान सीरिया में इस्लामिक स्टेट से लड़ रहे कुर्दबलों का समर्थन अमरीका ने किया जो सीरियाई सरकार के विरोधी थे. अमरीका ने उन्हें काफ़ी मात्रा में हथियार दिए जिनसे तुर्की परेशान हुआ क्योंकि तुर्की कुर्दों को चरमपंथी मानता है.

2019 आते-आते अमरीका ने कहा कि वो अपने सैनिक सीरिया से बाहर निकालेगा और उसके बाद उनसे कुर्द बलों को समर्थन देना बंद किया.

दूसरी तरफ़ सीरिया में एक सेफ़ ज़ोन बनाने के उद्देश्य से कुर्दबलों के ख़िलाफ़ तुर्की ने अभियान शुरु किया. ऐसे में अकेले पड़े कुर्दबलों को सीरियाई सरकार से मदद मांगनी पड़ी.

Friday, October 11, 2019

चीन-नेपाल में गहराती दोस्ती पर इतना शांत क्यों है भारत

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग नेपाल के दौरे पर जा रहे हैं. वो 12 और 13 अक्टूबर को नेपाल में रहेंगे.

नेपाल में इस दौरे की भरपूर तैयारियां चल रही हैं. इसकी ख़ास वजह भी है क्योंकि 23 साल बाद कोई चीनी राष्ट्रपति नेपाल पहुंच रहा है.

नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के विदेश मामलों के सलाहकार डॉ. राजन भट्टाराई ने इस दौरे को ऐतिहासिक बताया है.

उन्होंने बताया कि चीन के राष्ट्रपति के साथ उनका एक प्रतिनिधि दल भी होगा.

दोनों देशों के बीच कई समझौते होने की बात भी कही जा रही है. चीन के राष्ट्रपति और नेपाल के प्रधानमंत्री के बीच आधिकारिक बैठक भी तय हुई है.

नेपाल जाने से पहले चीन के राष्ट्रपति भारत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अनौपचारिक मुलाक़ात करेंगे. इससे पहले शी जिनपिंग पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के साथ भी बैठक कर चुके हैं.

चीन का प्रभाव दक्षिण एशिया में लगातार बढ़ रहा है. वो चाहे नेपाल, श्रीलंका, पाकिस्तान या बांग्लादेश हो. हर जगह चीन की मौजूदगी बढ़ी है. ये सभी देश चीन की वन बेल्ट वन रोड परियोजना में शामिल हो गए हैं. दूसरी तरफ़ भारत इस परियोजना के पक्ष में नहीं है.

इस हिंदू बहुल राष्ट्र में चीन का दिलचस्पी लेना काफ़ी अहम है. नेपाल अपनी कई ज़रूरतों के लिए भारत पर निर्भर है लेकिन वो लगातार भारत से निर्भरता को कम करने की कोशिश कर रहा है.

चीन ने साल 2017 में नेपाल के साथ अपनी बेल्ट एंड रोड परियोजना के लिए द्विपक्षीय सहयोग पर समझौता किया था. इस दौरान चीन ने नेपाल में क्रॉस-बॉर्डर इकोनॉमिक ज़ोन बनाने, रेलवे को विस्तार देने, हाइवे, एयरपोर्ट आदि के निर्माण कार्यों में मदद पहुंचाने पर भी सहमति जताई.

नेपाल के कई स्कूलों में चीनी भाषा मंदारिन को पढ़ना भी अनिवार्य कर दिया गया है. नेपाल में इस भाषा को पढ़ाने वाले शिक्षकों के वेतन का खर्चा भी चीन की सरकार ने उठाने के लिए तैयार है.

दरअसल, नेपाल के क़रीब जाने की कोशिश अकेला चीन ही नहीं बल्की अमरीका भी लगातार कर रहा है. एक तरफ़ जहां चीन अपनी बेल्ड एंड रोड परियोजना चला रहा है तो वहीं अमरीका इंडो-पैसिफ़िक नीति पर काम कर रहा है.

नेपाल में केपी शर्मा ओली के नेतृत्व में कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार बनने के बाद से ही अमरीका और चीन नेपाल के क़रीब जाने की कोशिशें कर रहे हैं.

इसी साल जून में अमरीकी रक्षा विभाग ने इंडो-पैसिफ़िक स्ट्रैटिजी रिपोर्ट (आईपीएआर) प्रकाशित की थी. इस रिपोर्ट में नेपाल के बारे में लिखा गया था, ''अमरीका नेपाल के साथ अपने रक्षा सहयोगों को बढ़ाना चाहता है. हमारा ध्यान आपदा प्रबंधन, शांति अभियान, ज़मीनी रक्षा ताक़त को बढ़ाने और आतंकवाद से मुक़ाबला करने पर है.''

हालांकि इसके जवाब में नेपाल सरकार के मंत्रियों और अधिकारियों ने कहा था कि नेपाल कोई भी ऐसा सैन्य गठबंधन नहीं करेगा जिसका निशाना चीन पर होगा.

दरअसल, चीन के प्रति नेपाल के इस रुख़ की भी ख़ास वजह है. चीन नेपाल में अपनी राजनीतिक, सैन्य और आर्थिक छाप छोड़ रहा है. चीन ने ही नेपाल से अमरीका की इंडो-पैसिफ़िक नीति में शामिल ना होने की अपील की है.

Thursday, September 19, 2019

Как за фигурантов "московского дела" вступились их коллеги по цеху

Вслед за священниками свои письма в поддержку фигурантов "московского дела" опубликовали другие профессиональные сообщества. Представители IT-индустрии вступились за программистов Айдара Губайдулина и Константина Котова, сотрудники НКО - за Алексея Миняйло, сотрудники театров - за Павла Устинова.

После того как Тверской суд на этой неделе приговорил актера Павла Устинова к 3,5 годам колонии общего режима, признав его виновным в применении насилия к полицейскому на акции протеста 3 августа, деятели культуры устроили флешмоб в его защиту и 18 сентября провели пикеты в поддержку него и других фигурантов "московского дела".

Параллельно с этим открытые письма в поддержку обвиняемых и уже осужденных по этом делу опубликовали священники Русской православной церкви и учителя, а вечером 18 сентября инициативу подхватил и и другие профессиональные сообщества.

Русская служба Би-би-си рассказывает, как представители разных профессий поддержали своих коллег, ставших фигурантами уголовных дел после летних протестов в Москве.

Специалисты IT-индустрии опубликовали свое открытое письмо, в котором вступились за Айдара Губайдулина и Константина Котова, на портале GitHub. На данный момент его подписали более 200 человек.

Они вступились за Айдара Губайдулина (накануне Мещанский суд отпустил его из-под стражи под подписку о невыезде, а дело вернул в прокуратуру) и Константина Котова, уже осужденного на четыре года колонии общего режима за неоднократные нарушения закона о митингах.

"Одним из фигурантов "московского дела" стал наш коллега - Айдар Губайдулин. Айдар закончил МФТИ и работает в компании "Сбербанк-Технологии". В это же время осудили другого нашего коллегу, программиста Константина Котова: он получил 4 года колонии за участие в четырёх акциях, ведь, по мнению обвинения, он преследовал "цель создания реальной угрозы конституционно охраняемым правам и свободам человека и гражданина", - говорится в письме.